ओलंपिक में महिला खिलाड़ियों को पसंद की पोशाक पहनने की आजादी: एक ऐतिहासिक संघर्ष

ओलंपिक में Women Dress Freedom की ऐतिहासिक लड़ाई

टोक्यो ओलंपिक के बैडमिंटन कोर्ट पर भारत की पीवी सिंधु ने जब अपने रैकेट से शॉर्ट्स लगाया, तो उनके पास खेल के अलावा एक और चीज़ अहम थी– चुनाव की आज़ादी। उनका कहना है कि ”मैं खुशकिस्मत हूं कि हम जो चाहे पहन सकते हैं।” पीवी सिंधु के ये वाक्य महिलाओं के ड्रेस को लेकर सदियों से चल रहे संघर्ष का जवाब था। जबकि, कोर्ट पर दूसरी महिला खिलाड़ियों ने ड्रेस और लेगिंग्स पहना था। ईरान की सोरया अघाई ने तो हिजाब पहना था। कोर्ट पर महिला खिलाड़ियों के ये दृश्य ओलंपिक में अपनी पसंद के कपड़े पहनने की लड़ाई का जीवंत चित्र था।

1900 में पेरिस ओलंपिक में पहली बार जब महिलाओं ने भाग लिया, तो उन्हें भारी-भरकम पोशाकें पहननी पड़ती थीं। लंबी स्कर्ट और ब्लाउज से लेकर हैट तक। तैराकी में भी पूरे कपड़े पहनने होते थे। 1920 के दशक में फ्रेंच टेनिस खिलाड़ी सुज़ान लेंगलेन ने घुटनों से ऊपर स्कर्ट पहनकर क्रांति ला दी। सुजान को काफी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। लेकिन, तब तक उन्होंने महिला खिलाड़ियों को अपनी पसंद की पोशाक पहनने की नई राह दिखा चुकी थी।

2012 के लंदन ओलंपिक से पहले शुरू हुआ विवाद इतिहास में दर्ज हो गया। जब बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन ने महिलाओं के लिए स्कर्ट पहनना अनिवार्य कर दिया। जिसे पुरजोर विरोध के कारण नियम को गेम्स शुरू होने से पहले ही खत्म करा दिया गया। महिलाओं की ये लड़ाई अब भी जारी है।

2016 के रियो ओलंपिक में एक और ऐतिहासिक पल सामने आया, जब अमेरिकी तलवारबाज इब्तिहाज मुहम्मद हिजाब पहनकर मैदान में उतरीं और हिजाब पहनकर ओलंपिक में भाग लेने वाली पहली अमेरिकी बनीं। उनकी यात्रा भी आसान नहीं थी। तलवारबाजी के यूनिफॉर्म ने उनके धार्मिक नियमों का पालन किया। लेकिन, उन्हें दर्शकों और दूसरे साथी एथलीटों की नफरत का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिकी टीम को कांस्य पदक दिलाने में सफल रहीं। टाइम मैगज़ीन ने भी उन्हें 2016 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया।

2021 में नॉर्वे की महिला बीच हैंडबॉल टीम ने एक साहसिक कदम उठाते हुए बिकिनी बॉटम के बजाय शॉर्ट्स पहनना चुना। जिसके बाद टीम पर 1,500 यूरो का जुर्माना लगा दिया गया। इस फैसले ने दुनिया भर में आग लगा दी। 2024 के टोक्यो ओलंपिक में जर्मनी की महिला जिमनास्टिक टीम ने कड़ा जवाब देते हुए क्वालिफिकेशन में फुल-बॉडी सूट पहनकर उतरीं। जिससे पसंद की आज़ादी का संदेश दिया जा सके।

ईरान की सोरया अघाई हाजियाघा भी इसी राह पर चलीं। उन्होंने भी हिजाब पहनकर बैडमिंटन खेला। ईरान जैसे देश से ओलंपिक का सफर आसान नहीं था। धार्मिक पाबंदियों के बावजूद सोरया अघाई ने हिजाब पहन कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। 2021 में आयोजित टोक्यो समर गेम्स में उन्होंने बैडमिंटन में भाग लेकर इतिहास रच दिया। ओलंपिक के 132 साल के इतिहास में सोरया अघाई को ग्लोबल ओलंपिक बॉडी में उस समय शामिल किया गया, जब IOC को पहली महिला प्रेसिडेंट कर्स्टी कोवेंट्री लीड कर रही हैं। IOC में अब 45% सदस्य महिलाएं हैं। सोरया अघाई का कार्यकाल 8 वर्ष का होगा।

महिला खिलाड़ियों के पोशाक की ये लड़ाई केवल कपड़ों की नहीं है। यह सम्मान, समानता और आजादी की लड़ाई है। जिसकी शुरुआत टोक्यो ओलंपिक से शुरू हुई। जब एक ही कोर्ट पर शॉर्ट्स, स्कर्ट और हिजाब, एक साथ दिखे। संदेश स्पष्ट था, खेल मैदान पर सुविधा, धर्म, संस्कृति और खिलाड़ियों की निजी पसंद का सम्मान होना चाहिए।

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