भारतीय खेल जगत में महिला खिलाड़ियों की पोशाक सिर्फ कपड़ों का मामला नहीं है। ये उनकी अस्मिता, आज़ादी और सामाजिक बंधनों के बीच एक संघर्ष की कहानी है। खेल के मैदान से शुरू होकर उनका ये संघर्ष समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है, जिससे उन्हें विरोध की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है।
भारतीय महिला खिलाड़ियों की पोशाक के संघर्ष के पहले विरोध का सामना सानिया मिर्ज़ा को करना पड़ा, जब शॉर्ट स्कर्ट पहनकर वे टेनिस कोर्ट पर उतरीं। एक चरमपंथी गुट ने सानिया मिर्जा के शॉर्ट स्कर्ट पहनने को युवा मुस्लिम लड़की का समाज की मान्यताओं को चुनौती देने का साहस माना, और उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया। जिसकी काफी तीखी आलोचना भी हुई। लेकिन, सानिया के हौसले बुलंद थे। उन्होंने अपने इरादे और हाथों में रैकेट दोनों को मज़बूती से थामे रखा। उन्होंने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था- “मैं कोर्ट पर जीतने आती हूं, अपने कपड़ों पर बहस करने नहीं।“
क्रिकेट की दुनिया में मिताली राज बड़ा नाम है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर और वनडे टीम की कप्तान मिताली राज ने जब 2017 में सोशल मीडिया पर एक स्लीवलेस टॉप में सेल्फी शेयर की, तो तूफान खड़ा हो गया। लोगों ने तस्वीर को ‘अश्लील‘ तक करार दे दिया। जबकि वे सिर्फ एक आम युवती की तरह गर्मियों में पोशाक पहनी थीं। मिताली ने लोगों को जवाब देते हुए कहा था- “मैंने अपने कपड़ों से क्रिकेट नहीं खेला, बल्कि क्रिकेट से कपड़ों को सम्मान दिलाया।” हालांकि, उनकी टिप्पणी ने एक बहस को जन्म दे दिया कि आखिर एक महिला खिलाड़ी की निजता और पसंद का अधिकार उसके खेल के प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण क्यों हो जाता है?
पुरुषों के पारंपरिक खेल पहलवानी में विनेश फोगाट ने जब कदम रखा, तो कुर्ता-पजामा छोड़कर, टी-शर्ट और ट्रैक पैंट पहनना शुरू किया। ये सिर्फ पोशाक का बदलाव नहीं था। एक स्त्री की सुविधा और स्वतंत्रता का अधिकार था। गांव की पृष्ठभूमि से आई विनेश के लिए राह आसान नहीं थी। जब उनके अपने ही समुदाय के कुछ लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। अपनी संस्कृति की दुहाई देने लगे। इस पर विनेश का जवाब स्पष्ट था- “जब मैं दांव पर लगी हूं, तो मेरी पोशाक, मेरी सहयोगी होनी चाहिए, बाधक नहीं।“
ये सभी महिलाएं अलग-अलग खेलों से भले ही ताल्लुक रखती हों, लेकिन उनका संघर्ष एक जैसा ही है। वे सभी एक ऐसे समाज में खेल रही हैं, जो अक्सर महिलाओं के शरीर और उनकी पोशाक को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। हर बार जब वे कोई नया फैशन या सुविधाजनक पोशाक चुनती हैं, तो उन पर ‘संस्कृति‘ और ‘शालीनता‘ की लाठी तान दी जाती है। इसके बावजूद इन खिलाड़ियों ने साबित किया है कि उनकी पहचान उनके कपड़ों से नहीं, बल्कि उनके प्रदर्शन, संघर्ष और जीत में है।
महिला खिलाड़ियों का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। अब भी कई खेल संघों में पारंपरिक पोशाक को लेकर कठोर नियम हैं। आवाज़ें भी उठ रही हैं। इसके बावजूद आज की युवा पीढ़ी इन्हीं महिला खिलाड़ियों से प्रेरणा ले रही हैं। स्कूल और कॉलेज स्तर पर खेलने वाली लड़कियां अब पारंपरिक सलवार-कमीज़ के साथ-साथ शॉर्ट्स और टी-शर्ट्स में आत्मविश्वास से दिखाई देती हैं। ये बदलाव एक दिन में नहीं आया। इसके बावजूद उनका ये संघर्ष जारी है।
















