पैरालंपिक खेलों के इतिहास में भारत का अब तक का प्रदर्शन काफी शानदार रहा है। 1960 में इन खेलों की शुरुआत के बाद से भारत ने इसमें शानदार प्रदर्शन करते हुए अब तक कुल 60 पदक जीते हैं। इसमें 16 स्वर्ण, 21 रजत और 23 कांस्य पदक शामिल है। पैरालंपिक खेलों में भारत के लिए पहला पदक मुरलीकांत पेटकर ने 1972 के हीडलबर्ग पैरालंपिक खेलों में स्विमिंग में स्वर्ण पदक के रूप में जीता था। हालांकि पैरालंपिक खेलों में भारत का अब तक का सबसे बेस्ट प्रदर्शन 2024 का पेरिस पैरालंपिक था। ऐसे में आइये, आपको भारत के टॉप-10 पुरुष पैरा खिलाड़ियों के बारे में बताते हैं-
1. मुरलीकांत पेटकर (स्विमिंग):
मुरलीकांत पेटकर को भारत का पहला पैरालंपिक पदक विजेता खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने 1972 हीडलबर्ग पैरालंपिक खेलों में पुरुषों की 50 मीटर फ्रीस्टाइल 3 इवेंट के स्विमिंग में स्वर्ण पदक जीता था। पेटकर ने तब 37.33 सेकेंड के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। उससे पहले 1965 के भारत-पाक युद्ध में भी उन्होंने अपना योगदान दिया था। पेटकर की कहानी अन्य पैरा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। वह शुरुआत में भारतीय सेना में कोर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) में एक जवान थे और मुक्केबाजी किया करते थे। लेकिन बुलेट इंजरी के कारण उन्हें अपना एक हाथ गंवाना पड़ा था। इस कारण बाद में वह तैराकी बन गए और 1972 हीडलबर्ग पैरालंपिक खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता। पेटकर को साल 2018 में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से नवाजा गया।
2. जोगिंदर सिंह बेदी (एथलेटिक्स):
शॉट पुट पैरा एथलीट जोगिंदर सिंह बेदी के नाम एक या दो नहीं बल्कि बल्कि तीन पैरालंपिक पदक जीतने का रिकॉर्ड है। बेदी ने 1984 न्यूयॉर्क पैरा ओलंपिक में यह कारनामा किया था। वह तीन पदक के साथ भारत के सबसे सफल पैरालंपियन है। उन्होंने 1984 न्यूयॉर्क पैरा ओलंपिक में अलग-अलग कटेगरी में दो रजत और एक कांस्य पदक जीता था। बेदी के बाद भारत ने इन खेलों में अगला पदक 2004 एथेंस पैरालंपिक में देवेंद्र झांझरिया के स्वर्ण पदक के रूप में जाता।
3. देवेंद्र झांझरिया (भाला फेंक):
भाला फेंक पैरा एथलीट, देवेंद्र झाझरिया के नाम पैरालंपिक खेलों में तीन पदक है। इनमें दो स्वर्ण और एक रजत पदक शामिल है। झांझरिया ने असफलताओं को अपनी कामयाबी के रास्ते में कभी आने नहीं दिया। झांझरिया ने सबसे पहले 2004 एथेंस पैरालंपिक खेलों में F46 श्रेणी में 62.15 मीटर के विश्व रिकॉर्ड थ्रो के साथ भारत के लिए पहला एथलेटिक्स स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद उन्होंने 2016 रियो और 2020 टोक्यो पैरालंपिक खेलों में देश को स्वर्ण और रजत पदक दिलाया। झांझरिया ने आठ साल की उम्र में एक दुर्घटना में अपना बायां हाथ खो दिया था, इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और पैरालंपिक खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। वह पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी हैं।
4. सुमित अंतिल (भाला फेंक):
भाला फेंक पैरा एथलीट सुमित अंतिल के नाम पुरुषों की भाला फेंक F64 स्पर्धा में 73.29 मीटर का वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने 2023 एशियाई पैरा खेलों में यह उपलब्धि हासिल की थी। हरियाणा के सोनीपत के सुमित अंतिल ने 2015 में एक भीषण मोटरसाइकिल दुर्घटना में अपना बायां पैर खो दिया था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सुमित ने 2020 टोक्यो पैरालंपिक खेलों में फाइनल में 68.55 मीटर का थ्रो करके ना सिर्फ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि उन्होंने तीन बार अपना ही वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा। अंतिल ने हाल में विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 में 71.37 मीटर के थ्रो के साथ एक नया चैंपियनशिप रिकॉर्ड भी बनाया। सुमित ने टोक्यो के अपने स्वर्णिम प्रदर्शन को पेरिस 2024 पैरालंपिक में भी जारी रखा, जहां उन्होंने अपना दूसरा स्वर्ण पदक जीता।
5. योगेश कथूनिया (डिस्कस थ्रो):
डिस्कस थ्रो पैरा एथलीट योगेश कथूनिया के नाम 2020 टोक्यो और 2024 पेरिस पैरालंपिक खेलों में रजत पदक है। योगेश कथूनिया नौ साल की उम्र में ही ‘गुइलेन-बैरी सिंड्रोम’ से ग्रसित हो गये थे। यह एक दुर्लभ बीमारी है जिसमें शरीर के अंगों में सुन्नता, झनझनाहट के साथ मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है और बाद में यह पक्षाघात (पैरालिसिस) का कारण बनता है। इसके बाद भी उन्होंने मेहनत करना जारी रखा और आगे चलकर वह भारत के डबल ओलंपिक मेडलिस्ट बने, ऐसे में उनके संघर्ष की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा वाली है।
6. मनीष नरवाल (शूटिंग):
भारतीय पैरा-पिस्टल निशानेबाज मनीष नरवाल के नाम कई रिकॉर्ड और पदक है। नरवाल के दाहिने हाथ में जन्म से ही तंत्रिका संबंधी समस्या (congenital impairment) है, जिससे उनके हाथ की गतिशीलता प्रभावित होती है। लियोनेल मेसी की तरह फुटबॉलर बनने का सपना देखने वाले नरवाल ने 2020 टोक्यो पैरालंपिक खेलों में P4 मिश्रित 50 मीटर पिस्टल SH1 स्पर्धा में ना सिर्फ स्वर्ण पदक जीता बल्कि 218.2 के स्कोर के साथ एक नया पैरालंपिक रिकॉर्ड भी बनाया। नरवाल ने इसके बाद 2024 पेरिस पैरालंपिक खेलों में पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल SH1 स्पर्धा में रजत पदक हासिल किया।
7. मरियप्पन थंगावेलु (ऊंची कूद):
पैरालंपिक में तीन पदक जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलु संघर्ष गरीबी, बचपन में लगी चोट और अपने परिवार का समर्थन करने की चुनौतियों से भरा है। थंगावेलु जब पांच साल के थे, तब स्कूल जाते समय एक बस ने उन्हें टक्कर मार दी थी, जिससे उनके दाहिने पैर को घुटने के नीचे स्थायी रूप से क्षति पहुंची और वह अविकसित रह गया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मरियप्पन थंगावेलु की मां ने पहले दिहाड़ी मजदूर के रूप में ईंटें ढोकर और बाद में सब्जियां बेचकर अपने छह बच्चों का पालन-पोषण किया। इन सबके बावजूद, मरियप्पन ने कभी भी खुद को सक्षम शरीर वाले बच्चों से अलग नहीं माना और ओलंपिक में तीन पदक जीतकर इतिहास रचा। उन्होंने 2016 रियो पैरालंपिक में स्वर्ण, 2020 टोक्यो पैरालंपिक में रजत और 2024 पेरिस पैरालंपिक में कांस्य पदक जीता। उनकी उपलब्धियों और जीवन पर “मरियाप्पन” नामक फिल्म भी बनाई गई।
8. हरविंदर सिंह (तीरंदाजी):
पैरा-तीरंदाज हरविंदर सिंह पैरालंपिक खेलों में तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय हैं। उन्होंने 2024 पेरिस पैरालंपिक में भारत को इस खेल का पहला ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाया था। हरियाणा के कैथल के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे हरविंदर सिंह ने बचपन में ही गलत इंजेक्शन के कारण पैरों की गतिशीलता खो दी थी। लेकिन उन्होंने कड़ी मेहनत की और देश को गौरवान्वित कराया। इसके अलावा उन्होंने 2020 टोक्यो पैरालंपिक खेलों में पुरुषों की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में कांस्य पदक जीता, जो पैरालंपिक में भारत का पहला तीरंदाजी पदक था।
9. कृष्णा नागर (बैडमिंटन):
जयपुर के कृष्णा नागर ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में अब तक 13 स्वर्ण, 11 रजत और 2 कांस्य पदक जीते हैं। उनके करियर की सबसे बड़ी सफलता 2020 टोक्यो पैरालंपिक में आया, जहां उन्होंने SH6 श्रेणी में स्वर्ण पदक जीता। अपनी 4’5″ की ऊंचाई (बौनापन) की चुनौतियों के बावजूद नागर ने देश के लिए कई बार इतिहास रचा है।
10. नितेश कुमार (बैडमिंटन):
भारतीय पैरा-बैडमिंटन खिलाड़ी नितेश कुमार (SL3 श्रेणी) 2024 पेरिस पैरालंपिक खेलों में देश के लिए इतिहास रच चुके हैं। नितेश ने 2009 में एक ट्रेन हादसे में अपना पैर गंवा दिया था। लेकिन बाद में प्रमोद भगत से प्रेरित होकर उन्होंने SL3 वर्ग में बैडमिंटन खेलना शुरू किया और फिर पेरिस में स्वर्ण पदक जीतकर ही दम लिया।


















