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भारतीय ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों की प्रेरणादायक कहानी

भारतीय ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों की प्रेरणादायक कहानी

1- केडी जाधव (कुश्ती 1952):

आजादी के बाद भारत के लिए ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत पदक केडी जाधव ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती में जीता था। 15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के गुलेश्वर नामक गांव में जन्मे केडी जाधव के पास उस समय हेलसिंकी जाने तक के पैसे नहीं थे क्योंकि उस समय उनके पास ना तो कोई स्पॉन्सर था और ना ही अन्य किसी तरह की कोई मदद थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। केडी जाधव ने गांव वालों से चंदा के रूप में पैसे इकट्ठा किए। इसके अलावा उनके कॉलेज के एक प्रिंसिपल ने अपना घर तक गिरवी रखकर उनके लिए करीब सात हजार रुपये जुटाए, ताकि वे ओलंपिक में भाग ले सके। इसके बाद केडी जाधव ने 1952 ओलंपिक में भाग लिया, जहां उन्होंने फ्रीस्टाइल वर्ग में कांस्य पदक जीता। केडी जाधव की कहानी यह दिखाती है कि कैसे सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प से सफलता हासिल की जा सकती है। आज भी कई पहलवान और खिलाड़ी उनसे प्रेरणा लेते हैं। हालांकि ओलंपिक में पदक जीतने के बाद भी उन्हें खेल महासंघ से वर्षों तक उपेक्षा सहनी पड़ी और अपने जीवन के अंतिम सालों में भी उन्हें अत्यंत गरीबी वाली जीवन बितानी पड़ी।

2- लिएंडर पेस (टेनिस 1996):

दिग्गज टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने 1996 में अटलांटा ओलंपिक में पुरुष एकल वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया था। वह ओलिंपिक में टेनिस में पदक जीतने वाले इकलौते भारतीय खिलाड़ी हैं। पेस का शुरुआती करियर बेहद आर्थिक तंगी में गुजरा और इसके कारण उन्हें मजबूरी में कई बार कम पैसों में खेलना पड़ता था। उन्हें घर से भी बहुत कम सपोर्ट मिलता था, इसलिए उन्हें कई बार ड्रेसिंग रूम में ही रात गुजारनी पड़ती थी। साल 2003 में पेस को ब्रेन डैमेज का पता चला, लेकिन इससे उबरकर उन्होंने कोर्ट पर शानदार वापसी की। पेस के पिता वेसे पेस 1972 म्यूनिख ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रह चुके थे। पेस के पिता का पिछले साल ही निधन हो गया था।

3- कर्णम मल्लेश्वरी (वेटलिफ्टिंग 2000):

आंध्र प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में जन्मी मल्लेश्वरी का बचपन बेहद गरीबी में बीता। साधारण परिवार में जन्म होने के कारण मल्लेश्वरी अच्छी डाइट और खेल सुविधाओं के लिए संघर्ष काफी करना पड़ा। लेकिन उनकी मां अपने घर के बजट से पैसे बचाकर उन्हें अच्छी डाइट देती थीं और प्रतियोगिताओं में उनके साथ जाती थीं। गरीबी के अलावा उन्हें सामाजिक बाधाओं का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वो डटी रहीं और उन्होंने करीब 13 साल की उम्र में वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू कर दी। मल्लेश्वरी ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप और फिर एशियाई खेलों में पदक जीतने के बाद 2000 सिडनी ओलंपिक में 54 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। अपनी इस सफलता के साथ ही वह ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

4- गगन नारंग (शूटिंग 2012):

निशानेबाज गगन नारंग की कहानी काफी अलग है। करीब 3 साल की उम्र में ही पिस्टल से गुब्बारे पर निशाना लगाने के बाद पिता भीमसेन नारंग ने उनकी प्रतिभा पहचान ली और उन्हें शूटिंग के लिए प्रोत्साहित किया। गगन नारंग पायलट बनना चाहते थे, लेकिन पिता से पिस्टल मिलने के बाद उन्होंने शूटिंग को ही पसंदीदा खेल बना लिया। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो शूटिंग में उनके करियर को आगे बढ़ाने के लिए उनके परिवार को अपना घर तक भी बेचना पड़ा और करीब 15 सालों तक किराए के मकान में रहना पड़ा। इसके बाद नारंग ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना शुरू कर दिया। उन्होंने 2008 बीजिंग ओलंपिक की निराशा को पीछे छोड़ते हुए 2012 लंदन ओलंपिक में पुरुषों के 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

5- योगेश्वर दत्त (कुश्ती 2012):

हरियाणा के सोनीपत जिले से ताल्लुक रखने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त के संघर्ष की कहानी मिट्टी के अखाड़े से लेकर ओलंपिक पोडियम तक की है। योगेश्वर को देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा किसी और से नहीं बल्कि टेनिस दिग्गज लिएंडर पेस के खेल से मिली थी। लेकिन उनका शुरुआती करियर गहरी चोटों और निजी दुखों से भरा रहा है। 2009 में घुटने की चोट के कारण उनका करियर लगभग खत्म सा हो गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर जोरदार वापसी की। हालांकि 2012 लंदन ओलंपिक से पहले ही उनके पिता का निधन हो गया और इससे उन्हें गहरा झटका लगा। लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा और 2012 के ही लंदन ओलंपिक में कुश्ती में पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। योगेश्वर की कहानी सिर्फ एक एथलीट की नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद न खोने वाली कहानी है।

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