भारत में जहाँ कभी खेल को केवल ‘शौक’ या ‘मनोरंजन’ समझा जाता था, आज एक नई क्रांति है। ये क्रांति न सिर्फ मैदानों में पदकों की चमक लेकर आई है, बल्कि युवाओं के सपनों को नई दिशा, उनकी ऊर्जा को मकसद भी दे रही है। इसका नाम है– खेलो इंडिया। इसकी परिकल्पना एक फिट, स्वस्थ और खेलों में भारत को सुपरपावर बनाना है।
खेल जब सिर्फ ‘मनोरंजन’ तक सीमित थे|
आज से तीन दशक पहले एक मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे को अक्सर एक डॉक्टर या इंजीनियर बनने की सलाह दी जाती थी। उसकी खेल की प्रतिभा को दबा दिया जाता था। खेल का मतलब स्कूल तक सीमित था। करियर की संभावनाएं भी दूर-दूर तक नहीं दिखती थी। खेल को ‘व्यावहारिक’ ही नहीं माना जाता था। जिससे प्रतिभाएं बिखर जाती थीं।
ऐतिहासिक कदम
साल 2016-17 में भारत सरकार ने खेलो इंडिया कार्यक्रम की नींव रखी। खेलो इंडिया का लक्ष्य स्पष्ट था। देश के युवाओं को फिट और स्वस्थ बनाना, खेलों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना और स्ट्रैटेजिक सोच व नेतृत्व कौशल विकसित करना। ये सिर्फ पदक जीतने के बारे में नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति तैयार की जाए, जो जमीनी स्तर से शुरू हो, जहां हर गली और हर गांव में एक संभावित चैंपियन छिपा हो। खेलो इंडिया ने सपनों को जमीन पर उतारने के लिए कई स्तर पर ढांचा तैयार किया।
खेलो इंडिया यूथ गेम्स
खेलो इंडिया यूथ गेम्स एक ऐसा मंच बना, जहां स्कूली बच्चों की प्रतिभा राष्ट्रीय स्तर पर चमकने लगी। एथलेटिक्स से लेकर कबड्डी, फुटबॉल से लेकर कुश्ती तक, कई खेलों में युवाओं को प्रतिस्पर्धा का मौका मिला।
छात्रवृत्ति और समर्थन
प्रतिभाशाली एथलीटों को आठ साल तक प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये की छात्रवृत्ति मिलनी शुरू हुई। इससे खिलाड़ियों की आर्थिक बाधा दूर होने लगी और खिलाड़ी निश्चिंत होकर ट्रेनिंग लेकर अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने में जुट गए।
हर किसी के लिए खेल खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स, शीतकालीन खेल और पैरा गेम्स ने इस दायरे को और बढ़ाया। यह संदेश दिया कि खेल हर किसी के लिए है।
भारत की खेलो नीति: 2036 के ओलंपिक की रणनीति
भारत के खेलों के भविष्य को लेकर ‘रोडमैप’ तैयार किया गया और खेलो भारत नीति-2025 साकार हुई। जिसके तहत 2036 के ओलंपिक खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन और संभावित मेजबानी का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया। कीर्ति कार्यक्रम के जरिए गांव-गांव में प्रतिभा की खोज, वर्ल्ड क्लास कोचिंग और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की कवायद शुरू की गई। इसके लिए 1,045 खेलो इंडिया केंद्र और 34 राज्य उत्कृष्टता केंद्र खोले गए। ये नीति विशेष रूप से महिलाओं, दिव्यांगजनों, जनजातीय और वंचित समुदायों को खेल के जरिए सशक्त बनाने पर केंद्रित है।
खेल के जरिए आर्थिक सशक्त बनाना और पर्यटन को बढ़ावा
खेलो इंडिया के तहत अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की मेजबानी और खेल स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहन देकर खेल को एक गंभीर आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत स्कूली पाठ्यक्रम में खेलों को शामिल किया गया, ताकि बचपन से ही फिटनेस की आदत डाली जा सके।
आंकड़े और उपलब्धियां
पिछले कुछ वर्षों में ठोस परिणाम भी सामने आने लगे हैं। 2,845 से अधिक खेलो इंडिया एथलीटों को ट्रेनिंग, उपकरण और मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। कीर्ति कार्यक्रम के 174 प्रतिभा मूल्यांकन केंद्रों के जरिए 9 से 18 साल के बच्चों में छिपी प्रतिभा तलाशी जा रही है।
खिलाडि़यों के प्रेरक बने मेडल विजेता
नीरज चोपड़ा, पी.वी. सिंधु, लवलिना बोरगोहेन जैसे खिलाड़ियों की सफलता युवाओं को प्रेरित कर रही हैं। अब खेल ‘करियर’ का एक सम्मानजनक और गौरवशाली विकल्प बन कर सामने आया है।
खेल युग की शुरुआत
आज भारत का युवा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। वे घर से बाहर निकलकर मैदान में दौड़ रहा है। सिर्फ नौकरी की तलाश में नहीं, बल्कि पदक और करियर की खोज में है। खेलो इंडिया और खेलो भारत नीति ने साबित किया है कि जब संकल्प दृढ़ हो और रणनीति स्पष्ट हो तो सपनों को उड़ान जरूर मिलती है।
खिलाड़ियों के निशाने पर 2036 का ओलंपिक
ये सफर अभी शुरुआत भर है। 2036 का ओलंपिक लक्ष्य दूर है, लेकिन राह बन चुकी है। एक ऐसे भारत की नींव पड़ चुकी है, जहां खिलाड़ियों को योद्धाओं की तरह सम्मान मिल रहा है। हर बच्चे में एक चैंपियन छिपा है। जिसे तराशा जा रहा है। भारत अब सिर्फ खेलों में भाग लेने वाला देश नहीं, एक सुपरपावर बनने की दौड़ में है। ये दौड़ जमीनी स्तर से युवाओं के दिलों में शुरू हुई है। ये खेलों की नहीं, एक नए आत्मविश्वास और राष्ट्रीय खेल पुनर्जागरण की कहानी है|
खेलो इंडिया का आयोजन
| कब | कहां |
|---|---|
| 2018 | दिल्ली |
| 2019 | महाराष्ट्र |
| 2020 | असम |
| 2021 | हरियाणा (2022 में आयोजन) |
| 2023 | मध्य प्रदेश |
| 2024 | तमिलनाडु |
| 2025 | बिहार |
















